
तरुण कौशिक, संपादक सर्वव्यापी
न्यायधानी बिलासपुर की पहचान विकास और सुविधाओं के शहर के रूप में की जाती रही है, लेकिन मौजूदा हालात में शहर की अनेक प्रमुख और अंदरूनी सड़कें बदहाली की तस्वीर पेश कर रही हैं। कहीं सड़कें गड्ढों में तब्दील हैं, तो कहीं बारिश के बाद कीचड़, जलभराव और उखड़ी हुई सड़कों ने आम नागरिकों की मुश्किलें बढ़ा दी हैं। सड़कों की लगातार बिगड़ती स्थिति के बीच सबसे बड़ा सवाल अब यह उठ रहा है कि पूर्व नगरीय प्रशासन एवं विकास विभाग मंत्री और वर्तमान विधायक अमर अग्रवाल आखिर चुप क्यों हैं?अमर अग्रवाल लंबे समय तक राज्य की राजनीति में महत्वपूर्ण जिम्मेदारी निभाते रहे हैं और नगरीय प्रशासन एवं विकास विभाग जैसे महत्वपूर्ण विभाग की जिम्मेदारी भी संभाल चुके हैं। बिलासपुर की स्थानीय राजनीति में उनका प्रभाव और प्रशासनिक अनुभव किसी से छिपा नहीं है। ऐसे में जब उनके ही शहर की सड़कें जगह-जगह बदहाल दिखाई दे रही हैं और नागरिक मूलभूत सुविधाओं को लेकर सवाल उठा रहे हैं, तब उनकी ओर से इस मुद्दे पर मुखर हस्तक्षेप नहीं दिखाई देना राजनीतिक और सार्वजनिक चर्चा का विषय बनता जा रहा है।सड़कें बनीं सवाल, जवाबदेही किसकी?बिलासपुर शहर में सड़क निर्माण, मरम्मत और रखरखाव को लेकर समय-समय पर बड़े दावे किए जाते रहे हैं। करोड़ों रुपये की लागत से सड़कें बनाई जाती हैं, मरम्मत के नाम पर राशि खर्च होती है और बारिश के पहले तथा बारिश के बाद सड़कों को दुरुस्त करने की कवायद भी दिखाई देती है। इसके बावजूद कई इलाकों में सड़कें कुछ ही समय बाद उखड़ने लगती हैं। सवाल यह है कि आखिर निर्माण की गुणवत्ता की निगरानी कौन कर रहा है और खराब सड़क के लिए जिम्मेदारी किसकी तय हो रही है?नागरिकों का कहना है कि सड़क खराब होने के बाद उसकी मरम्मत कर देना स्थायी समाधान नहीं है। जरूरत इस बात की है कि सड़क निर्माण की गुणवत्ता, ठेकेदारों की जवाबदेही, तकनीकी स्वीकृति, भुगतान और रखरखाव की पूरी प्रक्रिया की समीक्षा हो। यदि एक ही सड़क बार-बार टूटती है तो केवल मरम्मत करने के बजाय यह भी पूछा जाना चाहिए कि वह सड़क बार-बार खराब क्यों हो रही है।बारिश ने खोल दी व्यवस्था की पोलइस वर्ष बारिश के दौरान शहर के कई हिस्सों में सड़क और जलनिकासी व्यवस्था की कमजोरियां सामने आई हैं। कई स्थानों पर जलभराव के कारण सड़कें और अधिक खराब हुईं। जहां सड़क पहले से क्षतिग्रस्त थी, वहां गड्ढों में पानी भरने से दुर्घटना का खतरा बढ़ गया। दोपहिया वाहन चालकों, स्कूली बच्चों, बुजुर्गों और पैदल चलने वालों को विशेष परेशानी का सामना करना पड़ रहा है।शहर में यातायात का दबाव लगातार बढ़ रहा है। ऐसे में सड़क की खराब स्थिति केवल आवागमन की समस्या नहीं रह जाती, बल्कि यह सड़क सुरक्षा का गंभीर सवाल भी बन जाती है। गड्ढों से बचने के लिए वाहन चालक अचानक दिशा बदलते हैं, जिससे दुर्घटना की आशंका बढ़ती है। इसके बावजूद शहर की सड़कों की स्थिति को लेकर अपेक्षित राजनीतिक दबाव दिखाई नहीं देता।पूर्व मंत्री से शहर को अपेक्षा, फिर खामोशी क्यों?अमर अग्रवाल का बिलासपुर से पुराना राजनीतिक संबंध है। वे इस क्षेत्र का प्रतिनिधित्व करते रहे हैं और राज्य सरकार में नगरीय प्रशासन जैसे महत्वपूर्ण विभाग की जिम्मेदारी संभाल चुके हैं। इसलिए शहर की मूलभूत सुविधाओं से जुड़े सवालों पर उनसे सामान्य राजनीतिक कार्यकर्ता की तुलना में अधिक सक्रिय भूमिका की अपेक्षा स्वाभाविक है।ऐसे में सवाल उठता है कि जब बिलासपुर की जनता सड़कों की बदहाली से परेशान है तो विधायक अमर अग्रवाल इस मुद्दे पर खुलकर नगर निगम और संबंधित विभागों से जवाब क्यों नहीं मांग रहे हैं?क्या उन्होंने शहर की प्रमुख जर्जर सड़कों की सूची तैयार कराकर उनके सुधार की समयसीमा तय करने की मांग की है? क्या उन्होंने निर्माण कार्यों की गुणवत्ता की स्वतंत्र जांच की मांग की है? क्या उन्होंने निगम और लोक निर्माण विभाग के अधिकारियों के साथ सड़कवार समीक्षा की है? यदि ऐसा किया गया है तो इसकी जानकारी सार्वजनिक क्यों नहीं की गई?सत्ता किसी की हो, शहर तो जनता का हैबिलासपुर की बदहाली का मुद्दा किसी एक राजनीतिक दल या सरकार तक सीमित नहीं होना चाहिए। सत्ता में सरकार कोई भी हो, शहर की सड़कें जनता के पैसे से बनती हैं और उनकी गुणवत्ता की जिम्मेदारी संबंधित एजेंसियों की होती है। विपक्ष में बैठे जनप्रतिनिधियों की जिम्मेदारी भी केवल बयान जारी करने तक सीमित नहीं हो सकती। उन्हें जनता की समस्याओं को सरकार के सामने मजबूती से उठाना चाहिए।यही कारण है कि अमर अग्रवाल की चुप्पी पर सवाल इसलिए भी उठ रहे हैं क्योंकि वे नगरीय प्रशासन की कार्यप्रणाली और उसकी जिम्मेदारियों से भली-भांति परिचित रहे हैं। यदि व्यवस्था में कमी है तो उनके अनुभव का उपयोग शहर की समस्याओं को दूर कराने के लिए होना चाहिए।क्या सड़क निर्माण में सिर्फ बजट खर्च होना ही उपलब्धि है?बिलासपुर में समय-समय पर सड़क निर्माण और अधोसंरचना विकास के लिए बड़ी राशि स्वीकृत होती है। लेकिन सवाल राशि स्वीकृत होने का नहीं, बल्कि उसके परिणाम का है। यदि करोड़ों रुपये खर्च होने के बावजूद नागरिकों को गड्ढों और खराब सड़कों से राहत नहीं मिलती तो विकास की पूरी प्रक्रिया पर सवाल उठना स्वाभाविक है।शहरवासियों को ऐसी सड़क चाहिए जो पहली बारिश में न उखड़े, ऐसी नाली चाहिए जो बारिश में सड़क को तालाब न बनाए और ऐसी व्यवस्था चाहिए जिसमें खराब निर्माण के लिए जिम्मेदार व्यक्ति अथवा एजेंसी पर कार्रवाई हो।जनप्रतिनिधियों को अब सड़क पर उतरना होगाबिलासपुर की जनता अब केवल आश्वासन नहीं, बल्कि परिणाम चाहती है। सड़कें कब सुधरेंगी? कौन सी एजेंसी जिम्मेदार है? कितनी राशि खर्च हुई? किन ठेकेदारों ने काम किया? गुणवत्ता की जांच किसने की? खराब सड़क के लिए किस पर कार्रवाई हुई? इन सवालों के जवाब सार्वजनिक होने चाहिए।और इसी के साथ पूर्व नगरीय प्रशासन एवं विकास विभाग मंत्री तथा वर्तमान विधायक अमर अग्रवाल से भी जनता यह जानना चाहती है कि शहर की सड़कों की बदहाली पर उनकी रणनीति क्या है?क्या वे संबंधित अधिकारियों के साथ बैठक कर सड़कवार समीक्षा करेंगे? क्या वे खराब निर्माण की जांच की मांग करेंगे? क्या वे राज्य सरकार के सामने बिलासपुर के लिए विशेष सड़क सुधार अभियान की मांग रखेंगे? या फिर शहर की बदहाल सड़कों का मुद्दा भी राजनीतिक चुप्पी के बीच दब जाएगा?बिलासपुर की सड़कें अब केवल गड्ढों की कहानी नहीं हैं। वे व्यवस्था, जवाबदेही और जनप्रतिनिधियों की सक्रियता की परीक्षा बन चुकी हैं। शहर की जनता को अब भाषण नहीं, सड़क पर दिखाई देने वाला बदलाव चाहिए।




