तरुण कौशिक, संपादक सर्वव्यापी
प्रशासनिक व्यवस्था में भ्रष्टाचार के खिलाफ जीरो टॉलरेंस की बात लगातार कही जाती है, लेकिन जमीनी स्तर पर कुछ मामलों में तस्वीर इसके उलट नजर आने के आरोप लग रहे हैं। सवाल यह उठ रहा है कि जिन अधिकारियों पर उनके पूर्व पदस्थापना काल में गंभीर अनियमितताओं और नियम विरुद्ध कार्यों के आरोप लगे, उनके खिलाफ ठोस जांच और कार्रवाई के बजाय उन्हें फिर महत्वपूर्ण और मलाईदार पदों की जिम्मेदारी कैसे मिल रही है?मामला एक ऐसे अधिकारी से जुड़ा बताया जा रहा है, जिनके तहसीलदार के रूप में कार्यकाल के दौरान भूमाफियाओं से कथित सांठगांठ कर जमीन संबंधी मामलों में हेराफेरी किए जाने के आरोप सामने आए थे। इसके बाद एसडीएम के रूप में पदस्थ रहते हुए भी एक संस्था की जमीन के नियम विरुद्ध विक्रय की अनुमति अथवा प्रक्रिया से जुड़े गंभीर सवाल उठाए गए थे। इन आरोपों की निष्पक्ष जांच और जिम्मेदारी तय होने के बजाय अब उसी अधिकारी को दोबारा एसडीएम की जिम्मेदारी दिए जाने की चर्चा ने प्रशासनिक हलकों में सवाल खड़े कर दिए हैं।सबसे बड़ा सवाल यही है कि यदि किसी अधिकारी के कार्यकाल से जुड़े जमीन प्रकरणों में शिकायतें और गंभीर आरोप मौजूद हैं तो पहले उनकी निष्पक्ष जांच क्यों नहीं कराई गई? क्या संबंधित मामलों की विभागीय जांच पूरी हो चुकी है? यदि जांच में आरोप निराधार पाए गए तो इसकी सार्वजनिक जानकारी सामने क्यों नहीं आई और यदि आरोपों में प्रथम दृष्टया तथ्य पाए गए तो कार्रवाई क्यों नहीं हुई?प्रशासनिक पद किसी व्यक्ति का व्यक्तिगत अधिकार नहीं बल्कि जनता के हितों की जिम्मेदारी है। ऐसे में किसी अधिकारी की नई पदस्थापना से पहले उसके पूर्व कार्यकाल से जुड़े विवादों और शिकायतों का परीक्षण किया जाना जरूरी है।मामले को और गंभीर बनाने वाली बात यह है कि संबंधित अधिकारी के साथ पूर्व में कार्य कर चुके एक पटवारी की भी वापसी की चर्चा सामने आ रही है। आरोप है कि उसे फिर उसी अनुभाग में पदस्थ किए जाने की तैयारी है, जहां दोनों साथ में कार्य कर पाए।यदि यह पदस्थापना वास्तव में होती है तो सवाल उठना स्वाभाविक है कि क्या एक ही अधिकारी और उसी से जुड़े कर्मचारियों की पुरानी कार्यप्रणाली को दोबारा उसी क्षेत्र में स्थापित किया जा रहा है? क्या इससे जमीन संबंधी मामलों में पारदर्शिता प्रभावित नहीं होगी?यह पूरा मामला किसी व्यक्ति विशेष को दोषी ठहराने का नहीं, बल्कि प्रशासनिक पारदर्शिता का है। यदि आरोप गलत हैं तो जांच के माध्यम से स्थिति स्पष्ट होनी चाहिए और यदि आरोपों में सच्चाई है तो जिम्मेदार लोगों पर नियमानुसार कार्रवाई होनी चाहिए।सरकार और जिला प्रशासन से अपेक्षा है कि संबंधित अधिकारी के पूर्व कार्यकाल में हुए जमीन हस्तांतरण, बिक्री अनुमति, नामांतरण तथा अन्य विवादित मामलों की स्वतंत्र एवं निष्पक्ष जांच कराई जाए। साथ ही यह भी स्पष्ट किया जाए कि संबंधित अधिकारी और उनके साथ पूर्व में कार्य कर चुके कर्मचारियों की नई पदस्थापना किन आधारों पर की जा रही है।क्योंकि सवाल सिर्फ एक अधिकारी की पदस्थापना का नहीं है—सवाल यह है कि भ्रष्टाचार और अनियमितता के आरोपों पर कार्रवाई होगी या फिर वही चेहरे, वही व्यवस्था और वही शिकायतें एक बार फिर दोहराई जाएंगी?




