Newsछत्तीसगढ़

संपादक के कलम से…हरेली तिहार : माटी, खेती-किसानी अउ छत्तीसगढ़ी चिन्हारी के परब।

तरुण कौशिक, संपादक सर्वव्यापी

हरेली हमर छत्तीसगढ़ के अइसन तिहार आय, जेनमा सिरिफ खुशी अउ उमंग नइ, बल्कि हमर माटी, हमर खेती-किसानी, हमर गऊ-धन, हमर गांव-गंवई अउ हमर पुरखा मन के बिसवास के सुग्घर झलक दिखथे। सावन के हरियर महीना म जब खेत-खार हरियर चादर ओढ़ लेथे, चारों डहर हरियाली बगर जाथे, त हमर मनखे मन के मन म घलो नवा आस के किरन जागथे। एही हरियर आस के तिहार आय—हरेली।छत्तीसगढ़ के पहिचान गांव, खेती अउ किसानी ले जुड़ाय हवय। हमर किसनहा भाई मन अपन माथा के पसीना बहाके धरती दाई के कोरा म बीजहा डारथें अउ अपन जिनगी के आस धान के बाली म देखथें। हरेली ओही मेहनत के मान करइया परब आय। ए दिन खेती-किसानी म काम आवन वाले नांगर, जूड़ा, कुदारी, हंसिया, फावड़ा जइसन औजार मन के पूजा करे जाथे। औजार मन ला धो-पोंछ के, तेल-फूल चढ़ाके किसान अपन काम के साधन मन के परती कृतज्ञता जताथे।हरेली के दूसर बड़े चिन्हारी गऊ-धन आय। गऊ-बइला हमर किसानी के मजबूत सहारा रहिन अउ आज घलो गांव के जिनगी म ओकर महत्तम जगह हवय। ए तिहार हमन ला सिखाथे कि जिनगी सिरिफ मनखे मन के मेहनत ले नइ चलय, बल्कि धरती, पानी, जंगल, पशु-पंछी अउ पूरा परकिरती के संग ले चलथे।हरेली के बिहान गांव-गंवई म एक अलग किसम के रौनक रहिथे। घर के दुवार म नीम के डारा लगाय जाथे। लइका मन गली-गली म खेलथें, झूला झूलथें अउ हमर लोक परंपरा के रंग म रंग जाथें। ये सब देखके लागथे कि हमर तिहार सिरिफ मन के बहलई नइ, बल्कि पीढ़ी-दर-पीढ़ी चलत आवत हमर सांस्कृतिक चिन्हारी के जिंदा दस्तावेज आय।फेर आज के बखत म हरेली के असली संदेस ला समझना घलो जरूरी होगे। हरियर तिहार मनावत बखत अगर हमर गांव के खेत सूखत रहि जाही, किसान करजा म डूबत रहिही, जंगल कटत रहिही अउ पानी के जरिया सुखात जाही, त हमर तिहार के खुशी अधूरा रहि जाही। हरेली हमन ला सिरिफ हरियर रंग देखाय बर नइ कहय, बल्कि हमर जिनगी, हमर खेत-खार अउ हमर परकिरती ला सचमुच हरियर रखे के सीख देवथे।आज जरूरत ये बात के हवय कि नवा पीढ़ी अपन पुरखा मन के परंपरा ला सिरिफ किताब म नइ, बल्कि अपन जिनगी म जियय। हरेली के दिन औजार के पूजा करे के संग खेती के महत्तम ला समझय, गऊ-धन के सेवा करे, रूख-राई लगाय अउ पानी-बन ला बचाय के संकल्प घलो लेय।हरेली हमर माटी के सुगंध आय। ये हमर किसनहा के पसीना आय। ये हमर गांव के हंसी आय। ये हमर लोक-संस्किरति के पहिचान आय। ये हमर छत्तीसगढ़िया मन के अपनपन आय।आवव, ए हरेली म हमन सिरिफ तिहार नइ मनावन, बल्कि अपन माटी, अपन खेती, अपन किसनहा, अपन गऊ-धन अउ अपन परकिरती के मान करन। हर गांव हरियर रहय, हर खेत लहलहावय, हर किसनहा के घर म सुख-समरिधि के दिया जरय अउ हमर छत्तीसगढ़ के लोक-परंपरा पीढ़ी-दर-पीढ़ी जिंदा रहय—एही हरेली के असली संदेस आय।हरेली के पावन परब म सर्वव्यापी परिवार डहर ले जम्मो छत्तीसगढ़िया मन ला गाड़ा-गाड़ा बधाई।हरियर रहय हमर माटी, सुखी रहय हमर किसनहा अउ समरिध रहय हमर छत्तीसगढ़।

Related Articles

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Back to top button
error: Content is protected !!