तरुण कौशिक, संपादक सर्वव्यापी


छत्तीसगढ़ में ‘सेवा संकल्प अभियान’ और ‘आशीर्वाद का दीया’ जैसे आयोजनों ने सरकार की प्राथमिकताओं को लेकर एक बड़ा राजनीतिक और प्रशासनिक सवाल खड़ा कर दिया है। सरकार इसे जनसेवा, संगठन और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के प्रति सम्मान की भावना से जोड़कर देख रही हो सकती है, लेकिन सवाल यह है कि जब प्रदेश की जनता सड़क, बिजली, पानी, स्वास्थ्य, शिक्षा और कानून-व्यवस्था जैसी बुनियादी समस्याओं से जूझ रही हो, तब सरकार का इतना बड़ा राजनीतिक-प्रचारात्मक अभियान आखिर किस संदेश को सामने रख रहा है? क्या यह वास्तव में जनता के बीच सेवा का संकल्प है या सत्ता के शीर्ष नेतृत्व को प्रसन्न करने की राजनीतिक कवायद?‘आशीर्वाद का दीया’ जलाने की तस्वीरें निश्चित रूप से राजनीतिक रूप से आकर्षक हो सकती हैं, लेकिन तस्वीरों के पीछे का छत्तीसगढ़ भी तो दिखाई देना चाहिए। गांवों की सड़कों की हालत, अस्पतालों में डॉक्टर और सुविधाओं की कमी, स्कूलों की व्यवस्थाएं, बेरोजगार युवाओं की बेचैनी, किसानों की समस्याएं, सरकारी कार्यालयों में लंबित काम और कानून-व्यवस्था को लेकर उठते सवाल—इन सबका जवाब किसी दीपक की रोशनी से नहीं, बल्कि धरातल पर दिखाई देने वाले काम से मिलेगा।मुख्यमंत्री विष्णुदेव साय के नेतृत्व वाली सरकार के सामने सबसे बड़ी चुनौती यही है कि वह आयोजन और उपलब्धि के बीच अंतर को कम करे। यदि ‘सेवा संकल्प’ सचमुच सेवा का अभियान है तो उसका मूल्यांकन मंचों, नारों और दीप प्रज्वलन से नहीं, बल्कि उन नागरिकों के अनुभव से होना चाहिए जिनके लिए सरकार काम करने का दावा करती है। जनता के लिए अस्पताल कितना बदला? स्कूलों में शिक्षा की गुणवत्ता कितनी सुधरी? सड़कें कितनी बेहतर हुईं? बिजली और पेयजल की समस्या कितनी कम हुई? प्रशासनिक व्यवस्था में आम नागरिक को कितनी राहत मिली? यही वे सवाल हैं जिनके जवाब इस अभियान की वास्तविक सफलता तय करेंगे।दूसरी ओर, यदि भाजपा के भीतर ही कार्यकर्ताओं और प्रशासनिक तंत्र के किसी हिस्से में असंतोष या नाराजगी की बातें सामने आ रही हैं, तो सरकार और संगठन दोनों के लिए यह आत्ममंथन का विषय होना चाहिए। सत्ता केवल मंच पर दिखाई देने वाले चेहरों से नहीं चलती। सरकार की योजनाओं को जमीन तक पहुंचाने वाला कर्मचारी और सरकार को गांव-गांव तक पहुंचाने वाला कार्यकर्ता—दोनों ही शासन व्यवस्था की महत्वपूर्ण कड़ियां हैं। इसलिए यदि कहीं असंतोष है तो उसे प्रचार से ढकने के बजाय सुनना और उसका समाधान करना अधिक जरूरी है।यहीं ‘आशीर्वाद का दीया’ एक प्रतीक बन जाता है। सवाल यह नहीं कि दीया क्यों जलाया गया; सवाल यह है कि उसकी रोशनी किस दिशा में पड़ रही है? क्या वह जनता की समस्याओं पर रोशनी डाल रही है या केवल सत्ता के शीर्ष नेतृत्व के प्रति निष्ठा प्रदर्शित करने तक सीमित है? लोकतंत्र में प्रधानमंत्री के प्रति सम्मान अपनी जगह है, संगठन के प्रति निष्ठा अपनी जगह है और राजनीतिक कार्यक्रमों की अपनी भूमिका है। लेकिन राज्य सरकार की प्राथमिक जिम्मेदारी छत्तीसगढ़ की जनता के प्रति है।किसी भी सरकार के लिए सबसे आसान काम उपलब्धियों का प्रचार करना है और सबसे कठिन काम अपनी कमियों को स्वीकार करना। ‘सेवा संकल्प’ को यदि वास्तव में सार्थक बनाना है तो सरकार को दीपक के साथ एक ऐसी प्रशासनिक रोशनी भी जलानी होगी जो सरकारी अस्पतालों, स्कूलों, सड़कों, गांवों और सरकारी दफ्तरों तक पहुंचे। राजनीतिक निष्ठा का प्रदर्शन तभी अर्थपूर्ण होगा जब शासन की कार्यक्षमता पर जनता का भरोसा भी मजबूत हो।प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को प्रसन्न करने के लिए सरकार कितनी दूर तक राजनीतिक आयोजन कर सकती है, यह सरकार और संगठन का अपना निर्णय है। लेकिन छत्तीसगढ़ के नागरिकों के लिए असली सवाल इससे अलग है—उन्हें अपने मुख्यमंत्री से आशीर्वाद का दीया नहीं, विकास का उजाला चाहिए। उन्हें भाषण नहीं, बेहतर अस्पताल चाहिए; अभियान नहीं, रोजगार के अवसर चाहिए; नारों से अधिक अच्छी सड़कें चाहिए; प्रचार से ज्यादा पारदर्शी प्रशासन चाहिए।इसलिए ‘सेवा संकल्प अभियान’ का सबसे कठोर और सबसे ईमानदार मूल्यांकन यही होगा कि सरकार स्वयं से पूछे—क्या जनता को वास्तव में सेवा मिली या केवल सेवा का संदेश दिया गया? क्या संगठन के कार्यकर्ता संतुष्ट हैं या उनके भीतर कोई असंतोष है? क्या अधिकारी व्यवस्था को बेहतर बनाने के लिए स्वतंत्र और जवाबदेह होकर काम कर रहे हैं? और सबसे महत्वपूर्ण, क्या सरकार के फैसलों का केंद्र छत्तीसगढ़ की जनता है या राजनीतिक नेतृत्व को खुश रखने की प्राथमिकता?‘आशीर्वाद का दीया’ जलाना आसान है, लेकिन उस रोशनी को जनता के घर तक पहुंचाना कठिन। छत्तीसगढ़ अब इसी फर्क का हिसाब मांग रहा है। यदि सेवा संकल्प सच है तो उसका प्रमाण दीपक की लौ में नहीं, बल्कि प्रदेश की बदली हुई तस्वीर में दिखाई देना चाहिए। वरना इतिहास ऐसे अभियानों को जनसेवा के दस्तावेज के रूप में नहीं, बल्कि सत्ता के आत्मप्रचार के एक और अध्याय के रूप में पढ़ सकता है।



