
तरुण कौशिक, संपादक सर्वव्यापी
छत्तीसगढ़ की विष्णुदेव साय सरकार भ्रष्टाचार के खिलाफ जीरो टॉलरेंस की नीति का दावा करती रही है, लेकिन सरकार और प्रशासन से जुड़े विभिन्न मामलों में समय-समय पर सामने आ रहे करोड़ों रुपये के कथित भ्रष्टाचार के आरोप अब सरकार की कार्यप्रणाली और प्रशासनिक व्यवस्था के लिए गंभीर सवाल खड़े कर रहे हैं। इन आरोपों के बीच मुख्यमंत्री के प्रमुख सचिव सुबोध कुमार सिंह और सचिव पी. दयानंद के सामने सबसे बड़ी चुनौती केवल आरोपों को खारिज करना नहीं, बल्कि तथ्यों और दस्तावेजों के माध्यम से यह साबित करना है कि सरकार की व्यवस्था में भ्रष्टाचार के लिए कोई जगह नहीं है।आज सोशल मीडिया ने किसी भी आरोप को मिनटों में प्रदेशभर में पहुंचाने का बड़ा मंच उपलब्ध करा दिया है। किसी अधिकारी, विभाग या सरकार के खिलाफ लगाए गए आरोप यदि बिना जांच और तथ्यात्मक पुष्टि के लगातार प्रसारित होते रहें, तो वे शासन की छवि को प्रभावित करने की क्षमता रखते हैं। दूसरी ओर यदि किसी गंभीर आरोप पर सरकार की ओर से स्पष्ट और तथ्यात्मक जवाब नहीं आता, तो यही खामोशी लोगों के बीच तरह-तरह की चर्चाओं को जन्म देती है।ऐसे में सवाल यह नहीं होना चाहिए कि सोशल मीडिया पर कौन क्या लिख रहा है, बल्कि सवाल यह होना चाहिए कि जो आरोप लगाए जा रहे हैं, उनकी सच्चाई क्या है? यदि आरोप निराधार हैं तो सरकार को जांच और दस्तावेजों के जरिए उन्हें गलत साबित करना चाहिए और यदि किसी मामले में प्रथम दृष्टया अनियमितता सामने आती है तो जिम्मेदार लोगों पर कार्रवाई कर यह संदेश देना चाहिए कि शासन में किसी के लिए संरक्षण की गुंजाइश नहीं है।मुख्यमंत्री के प्रमुख सचिव सुबोध कुमार सिंह और सचिव पी. दयानंद जैसे वरिष्ठ अधिकारियों के सामने इसलिए बड़ी जिम्मेदारी है कि शासन की पारदर्शिता केवल सरकारी बैठकों और बयानों तक सीमित न रहे, बल्कि आम जनता को भी यह दिखाई दे कि भ्रष्टाचार के आरोपों पर निष्पक्ष जांच होती है और दोषी पाए जाने पर कार्रवाई भी होती है।सरकार की साख केवल उपलब्धियों से नहीं बनती, बल्कि आरोपों पर उसकी प्रतिक्रिया और कार्रवाई से भी तय होती है। यदि सोशल मीडिया पर लगातार सरकार और अधिकारियों को लेकर सवाल उठ रहे हैं, तो उनका जवाब सोशल मीडिया की बहस से नहीं, बल्कि जांच, दस्तावेज और पारदर्शी कार्रवाई से दिया जाना चाहिए।छत्तीसगढ़ की जनता को यह भरोसा चाहिए कि सत्ता बदले तो व्यवस्था भी बदलेगी, और जीरो टॉलरेंस केवल नारा नहीं बल्कि प्रशासनिक कार्रवाई में दिखाई देगा। अब निगाहें इस बात पर हैं कि सरकार करोड़ों रुपये के कथित भ्रष्टाचार से जुड़े आरोपों को किस तरह तथ्यात्मक रूप से गलत साबित करती है और किन मामलों में जांच व कार्रवाई को आगे बढ़ाती है।क्योंकि शासन की असली परीक्षा आरोप लगने पर नहीं, बल्कि उन आरोपों का पारदर्शी और तथ्यात्मक जवाब देने पर होती है।




