अर्नब के बाद मुरासु का कहर: बर्बाद फसल, टूटती उम्मीदें और किसानों पर कर्ज का बोझ; अब मुआवजे के साथ कर्ज माफी की उठने लगी मांग।
विकास नंद/ सर्वव्यापी

प्रकृति की दोहरी मार ने किसानों की कमर तोड़कर रख दी है। पहले अर्नब साइक्लोन और अब मुरासु चक्रवात ने किसानों की मेहनत और उम्मीदों पर पानी फेर दिया है। लगातार खराब मौसम और चक्रवाती प्रभाव के चलते महासमुंद जिले सहित सरायपाली विकासखंड के अनेक ग्रामीण क्षेत्रों में धान की फसल को भारी नुकसान पहुंचने की स्थिति बनी है। खेतों में लहलहाती फसल पर संकट के बादल मंडरा रहे हैं। कहीं धान की फसल प्रभावित हुई है तो कहीं किसानों को अपनी महीनों की मेहनत बर्बाद होने की चिंता सता रही है।
दो चक्रवातों ने किसानों की आर्थिक स्थिति बिगाड़ी
खरीफ सीजन में किसानों ने खाद, बीज, कीटनाशक, मजदूरी और कृषि कार्यों के लिए बड़ी रकम खर्च की है। कई किसानों ने सहकारी समितियों और बैंकों से कृषि ऋण लिया है, जबकि कुछ किसानों ने निजी स्तर पर भी उधार लेकर खेती में निवेश किया है। अच्छी पैदावार और बेहतर आमदनी की उम्मीद के साथ किसानों ने दिन-रात मेहनत की, लेकिन अर्नब के बाद मुरासु चक्रवात के प्रभाव ने उनकी उम्मीदों को गहरा झटका दिया है।
सरायपाली विकासखंड के ग्रामीण इलाकों में धान की फसल को हुए नुकसान ने किसानों की चिंता बढ़ा दी है। जिन खेतों में कुछ दिन पहले तक अच्छी पैदावार की उम्मीद दिखाई दे रही थी, वहां अब किसान मौसम की मार से हुए नुकसान का आकलन करने में जुटे हैं। फसल प्रभावित होने से आगामी धान खरीदी सीजन में किसानों की आर्थिक स्थिति पर भी असर पड़ने की आशंका है।
मुआवजे के साथ कर्ज माफी की उठने लगी मांग
लगातार प्राकृतिक आपदाओं से प्रभावित किसानों का कहना है कि खेती पहले ही महंगी हो चुकी है। खाद, बीज, डीजल, मजदूरी और अन्य कृषि सामग्री की बढ़ती लागत के बीच मौसम की मार ने उनकी आर्थिक स्थिति को और कमजोर कर दिया है। ऐसे में यदि फसल का नुकसान हुआ तो किसानों के सामने बैंक ऋण चुकाने, अगली फसल की तैयारी करने और परिवार का भरण-पोषण करने की चुनौती खड़ी हो जाएगी।
इसी परिस्थिति को देखते हुए प्रभावित किसानों की ओर से साय सरकार से फसल क्षति का निष्पक्ष सर्वेक्षण कराकर उचित मुआवजा देने तथा कृषि ऋण माफ करने की मांग उठने लगी है। किसानों का कहना है कि जब प्राकृतिक आपदा के कारण उनकी फसल बर्बाद हो रही है तो उन्हें आर्थिक संकट से उबारने की जिम्मेदारी भी सरकार को उठानी चाहिए।
प्रशासनिक सर्वेक्षण और राहत पर टिकी किसानों की निगाहें
अब किसानों की निगाहें जिला प्रशासन और राज्य सरकार पर टिकी हुई हैं। प्रभावित क्षेत्रों में राजस्व एवं कृषि विभाग की संयुक्त टीमों से खेतों का वास्तविक सर्वेक्षण कराने, फसल क्षति का सही आकलन करने और पात्र किसानों को शीघ्र मुआवजा उपलब्ध कराने की मांग की जा रही है। साथ ही फसल बीमा के दायरे में आने वाले किसानों को नियमानुसार बीमा दावा दिलाने की प्रक्रिया भी तेज करने की अपेक्षा है।
किसानों का कहना है कि केवल सर्वेक्षण और आश्वासन से उनकी समस्या का समाधान नहीं होगा, बल्कि नुकसान के अनुपात में समय पर आर्थिक सहायता मिलनी चाहिए। विशेषकर छोटे और सीमांत किसानों के लिए यह संकट अधिक गंभीर है, क्योंकि उनकी आजीविका का मुख्य आधार खेती ही है।
सवाल यह है कि आखिर कब मिलेगी किसानों को राहत?
अर्नब के बाद मुरासु की मार ने किसानों के सामने एक बार फिर प्राकृतिक आपदा और आर्थिक असुरक्षा का सवाल खड़ा कर दिया है। यदि समय रहते राहत नहीं मिली तो कर्ज के बोझ तले दबे किसानों के लिए अगली खेती की तैयारी करना भी मुश्किल हो सकता है। ऐसे में प्रभावित किसानों को उम्मीद है कि मुख्यमंत्री विष्णुदेव साय के नेतृत्व वाली सरकार उनकी पीड़ा को गंभीरता से लेते हुए फसल क्षति का उचित मुआवजा, कृषि ऋण में राहत और जरूरत पड़ने पर कर्ज माफी जैसे ठोस कदम उठाएगी।