तरुण कौशिक, संपादक सर्वव्यापी
छत्तीसगढ़ के प्रशासनिक गलियारों में परिवहन आयुक्त के महत्वपूर्ण पद पर नियुक्ति को लेकर चर्चाओं का बाजार गर्म होने की बात सामने आ रही है। इस बीच पद को लेकर कथित तौर पर ₹5 करोड़ की सौदेबाजी की चर्चा ने कई गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। हालांकि, इस कथित लेन-देन के संबंध में फिलहाल कोई सत्यापित दस्तावेज, आधिकारिक पुष्टि अथवा ठोस प्रमाण सामने होने की जानकारी उपलब्ध नहीं है। ऐसे में इन चर्चाओं की स्वतंत्र पुष्टि और निष्पक्ष जांच आवश्यक है।परिवहन आयुक्त का पद केवल एक प्रशासनिक जिम्मेदारी नहीं, बल्कि प्रदेश की परिवहन व्यवस्था, वाहन पंजीयन, परमिट, प्रवर्तन, सड़क सुरक्षा और विभागीय राजस्व से जुड़े महत्वपूर्ण दायित्वों का केंद्र है। ऐसे महत्वपूर्ण पद पर नियुक्ति यदि निर्धारित प्रशासनिक प्रक्रिया, वरिष्ठता, अनुभव और योग्यता के आधार पर होती है, तो इससे शासन की कार्यप्रणाली में विश्वास मजबूत होता है। लेकिन यदि किसी पद को लेकर आर्थिक लेन-देन की चर्चाएं सामने आती हैं, तो स्वाभाविक रूप से पारदर्शिता और जवाबदेही को लेकर प्रश्न उठने लगते हैं।आखिर किसे मिलेगी परिवहन आयुक्त की जिम्मेदारी?इस पूरे मामले में सबसे बड़ा सवाल यही है कि परिवहन आयुक्त के पद पर नियुक्ति को लेकर शासन की क्या प्रक्रिया है और इस महत्वपूर्ण जिम्मेदारी के लिए किन अधिकारियों के नाम पर विचार किया जा रहा है? क्या नियुक्ति निर्धारित प्रशासनिक मानदंडों के आधार पर होगी, अथवा पद को लेकर चल रही कथित सौदेबाजी की चर्चाओं में कोई वास्तविकता है? इन सवालों का जवाब केवल आधिकारिक जानकारी, दस्तावेजों और तथ्यों के आधार पर ही सामने आ सकता है।यदि ₹5 करोड़ में पद दिलाने से संबंधित चर्चा के पीछे कोई ठोस आधार है, तो यह केवल प्रशासनिक नियुक्ति का मामला नहीं रह जाता, बल्कि संभावित भ्रष्टाचार और सरकारी व्यवस्था की निष्पक्षता से जुड़ा गंभीर विषय बन जाता है। हालांकि, किसी व्यक्ति या अधिकारी की संलिप्तता का निष्कर्ष जांच और प्रमाण के बिना निकालना उचित नहीं होगा।सरकार की पारदर्शिता की कसौटी पर महत्वपूर्ण नियुक्तिसरकारी पदों पर नियुक्ति को लेकर उठने वाले सवालों का समाधान अटकलों से नहीं, बल्कि पारदर्शी प्रक्रिया और आधिकारिक स्पष्टीकरण से होना चाहिए। शासन को यह सुनिश्चित करना चाहिए कि महत्वपूर्ण प्रशासनिक पदों पर नियुक्तियां स्पष्ट मानदंडों के अनुसार हों और किसी भी प्रकार के अनुचित प्रभाव अथवा आर्थिक लेन-देन की शिकायत मिलने पर उसकी निष्पक्ष जांच की जाए।परिवहन विभाग जैसे महत्वपूर्ण महकमे में जवाबदेही इसलिए भी जरूरी है, क्योंकि इसकी कार्यप्रणाली का सीधा संबंध आम नागरिकों, वाहन संचालकों, परिवहन व्यवसायियों और सरकारी राजस्व से है। ऐसे में विभाग के शीर्ष पद पर नियुक्ति को लेकर उठने वाली किसी भी गंभीर आशंका को नजरअंदाज करने के बजाय तथ्यों के आधार पर स्पष्ट किया जाना चाहिए।जवाबदेही के घेरे में कई सवालक्या परिवहन आयुक्त के पद पर नियुक्ति की प्रक्रिया को लेकर शासन आधिकारिक स्थिति स्पष्ट करेगा? क्या ₹5 करोड़ की कथित सौदेबाजी के दावे के समर्थन में कोई प्रमाण या शिकायत मौजूद है? क्या इस संबंध में किसी सक्षम एजेंसी अथवा विभागीय स्तर पर जांच की आवश्यकता महसूस की गई है? और सबसे महत्वपूर्ण, क्या नियुक्ति प्रक्रिया को लेकर सार्वजनिक रूप से ऐसी जानकारी उपलब्ध कराई जाएगी, जिससे किसी भी प्रकार के अनुचित प्रभाव की आशंका दूर हो सके?इन सवालों का जवाब सामने आना जरूरी है। साथ ही, संबंधित अधिकारियों और शासन का पक्ष सामने आने से मामले की वास्तविक स्थिति स्पष्ट हो सकेगी।फिलहाल चर्चा, लेकिन जवाब तथ्यों से ही मिलेगापरिवहन आयुक्त के पद पर आखिर किस अधिकारी की नियुक्ति होगी, यह शासन के आधिकारिक निर्णय से ही स्पष्ट होगा। वहीं, ₹5 करोड़ की कथित सौदेबाजी की चर्चा की सत्यता भी स्वतंत्र पुष्टि और विश्वसनीय साक्ष्यों के आधार पर ही निर्धारित की जा सकती है।लोकतांत्रिक व्यवस्था में प्रशासनिक नियुक्तियों को लेकर सवाल उठाना अस्वाभाविक नहीं है, लेकिन किसी भी गंभीर आरोप की निष्पक्ष जांच और संबंधित पक्षों का जवाब भी उतना ही महत्वपूर्ण है। अब निगाहें इस बात पर हैं कि शासन नियुक्ति प्रक्रिया को लेकर क्या रुख अपनाता है और कथित आर्थिक लेन-देन से जुड़ी चर्चाओं पर कोई आधिकारिक स्पष्टीकरण सामने आता है या नहीं।


