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लोक कलाकारों की आवाज : डॉ. संजय कन्नोजे जैसे संवेदनशील अफसर को मिले कलेक्टर की जिम्मेदारी, संस्कृति से प्रशासन तक बनाई अलग पहचान,तीन महीने का संस्कृति विभाग का कार्यकाल बना चर्चा का विषय, कलाकारों ने बताया ऐतिहासिक पहल और संवेदनशील प्रशासन का उदाहरण।

तरुण कौशिक, संपादक सर्वव्यापी

छत्तीसगढ़ की कला, संस्कृति और लोक परंपराओं को नई पहचान दिलाने की दिशा में संस्कृति विभाग के संचालक पद पर भारतीय प्रशासनिक सेवा के अधिकारी डॉ. संजय कन्नोजे का अल्प कार्यकाल अब प्रदेश के कलाकारों के बीच चर्चा का विषय बन गया है। लोक कलाकारों, संगीत साधकों और सांस्कृतिक क्षेत्र से जुड़े लोगों का कहना है कि मात्र तीन महीने के कार्यकाल में जिस तरह डॉ. कन्नोजे ने कलाकारों से सीधा संवाद स्थापित किया और संस्कृति को जन-जन तक पहुंचाने का प्रयास किया, वह छत्तीसगढ़ के प्रशासनिक इतिहास में एक अलग उदाहरण के रूप में देखा जाना चाहिए।कलाकारों का कहना है कि सामान्य तौर पर प्रशासनिक पदों पर बैठे अधिकारी योजनाओं और फाइलों तक सीमित रह जाते हैं, लेकिन डॉ. कन्नोजे ने संस्कृति विभाग को केवल सरकारी विभाग नहीं बल्कि कलाकारों की उम्मीदों और भावनाओं से जुड़ा मंच बनाने का प्रयास किया। यही कारण है कि प्रदेश के अनेक लोक कलाकार उनके कार्यकाल को बेहद प्रभावी और यादगार बता रहे हैं।लोक कलाकारों और गायकों को मिला नया आत्मविश्वासडॉ. संजय कन्नोजे के कार्यकाल में कलाकारों के साथ संवाद, सांस्कृतिक गतिविधियों को बढ़ावा देने और लोक परंपराओं को सम्मान देने की पहल ने कलाकार समुदाय में सकारात्मक संदेश दिया। कलाकारों का मानना है कि प्रशासनिक अधिकारी यदि संवेदनशील सोच के साथ काम करें तो सरकारी योजनाओं का वास्तविक लाभ समाज के अंतिम व्यक्ति तक पहुंच सकता है।इसी संवेदनशील कार्यशैली का उदाहरण सारंगढ़-बिलाईगढ़ जिले में भी देखने को मिला, जहां डॉ. कन्नोजे ने लगभग एक वर्ष के कार्यकाल में जिले की प्रशासनिक व्यवस्था को बेहतर बनाने के साथ कई क्षेत्रों में सुधार की दिशा में काम किया। स्थानीय लोगों और समर्थकों का कहना है कि कम समय में जिले की पहचान बनाने का प्रयास किया गया।सोमनाथ धार्मिक यात्रा बनी ऐतिहासिक पहलछत्तीसगढ़ के इतिहास में पहली बार लगभग एक हजार कलाकारों और लोक गायकों को जोड़ते हुए सोमनाथ धार्मिक यात्रा का आयोजन किया गया, जिसमें डॉ. संजय कन्नोजे ने स्वयं नेतृत्व किया। कलाकारों का कहना है कि यह केवल एक यात्रा नहीं थी, बल्कि छत्तीसगढ़ की लोक संस्कृति, कला और कलाकारों को सम्मान देने की दिशा में एक बड़ा प्रयास था।कलाकारों के अनुसार, इस पहल से प्रदेश के दूर-दराज क्षेत्रों में रहने वाले लोक कलाकारों को भी यह महसूस हुआ कि शासन और प्रशासन उनके साथ खड़ा है। इस तरह की पहल से सांस्कृतिक विरासत को मजबूत करने में मदद मिलती है।शिकायतों के आधार पर हटाने पर उठ रहे सवालसारंगढ़-बिलाईगढ़ जिले में डॉ. कन्नोजे के स्थानांतरण को लेकर भी अब चर्चा शुरू हो गई है। कुछ कलाकारों और स्थानीय लोगों का कहना है कि यदि कोई अधिकारी बेहतर कार्य कर रहा है और जनता के बीच सकारात्मक छवि बना रहा है तो केवल कुछ शिकायतों के आधार पर ऐसे अधिकारियों को हटाने से शासन की कार्यप्रणाली पर भी सवाल उठते हैं।उनका कहना है कि लोकतंत्र में शिकायतों की जांच आवश्यक है, लेकिन अच्छे कार्य करने वाले अधिकारियों को प्रोत्साहित करना भी सरकार की जिम्मेदारी है। किसी भी अधिकारी का मूल्यांकन उसके कार्य, परिणाम और जनता के अनुभव के आधार पर होना चाहिए।कलेक्टर की जिम्मेदारी के लिए उपयुक्त मान रहे कलाकारप्रदेश के कलाकारों और सांस्कृतिक क्षेत्र से जुड़े लोगों का मत है कि डॉ. संजय कन्नोजे जैसे संवेदनशील और नवाचार करने वाले अधिकारी को किसी जिले की कलेक्टरी की जिम्मेदारी दी जानी चाहिए। उनका मानना है कि जिला कलेक्टर के रूप में वे प्रशासन को केवल सरकारी व्यवस्था तक सीमित नहीं रखेंगे, बल्कि आम जनता, कलाकारों, गरीबों और जरूरतमंदों तक योजनाओं का लाभ पहुंचाने में प्रभावी भूमिका निभा सकते हैं।विष्णुदेव साय सरकार की छवि जनहित और सुशासन के संदेश से जुड़ी हुई है। ऐसे में जनता के बीच लोकप्रिय और बेहतर कार्य करने वाले अधिकारियों को महत्वपूर्ण जिम्मेदारी देकर सरकार अपनी प्रशासनिक सोच को और मजबूत कर सकती है।डॉ. संजय कन्नोजे का उदाहरण यह बताता है कि प्रशासनिक पद केवल अधिकार का माध्यम नहीं, बल्कि समाज से जुड़कर बदलाव लाने का अवसर भी है। अब देखना होगा कि सरकार ऐसे संवेदनशील अधिकारियों की कार्यक्षमता का उपयोग किस तरह करती है और भविष्य में उन्हें कौन सी महत्वपूर्ण जिम्मेदारी मिलती है।

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